Tuesday, 19 December 2017

जीविकोपार्जन और सुखोपार्जन के साधन।

               एक व्यक्ति के जीविकोपार्जन और सुखोपार्जन के साधन अलग अलग हो सकते हैं। यह जरूरी नहीं कि जीविकोपार्जन का साधन उसके सुखोपार्जन का भी साधन हो।यह सही है कि व्यक्ति के पद और अर्थोपार्जन के साधन के द्वारा उस व्यक्ति की पहचान होती है और इसी के अनुरूप मान सम्मान भी मिलता है।यह सही है कि पद से प्रतिष्ठा जुडी होती है, लेकिन किसी के दिल में जगह और सम्मान अपने कर्म और व्यक्तित्व से कमाई जाती है।
       अतः जीविकोपार्जन का साधन उस व्यक्ति की पहचान का एकमात्र तरीका नहीं है।लेखिकीय कर्म करनेवाला देश का एक सजग सचेत नागरिक होता है, पर उसे वह मान सम्मान नहीं मिलता, जिसका वह हकदार है।
               पुरस्कारों की जब बात होती है, लेखकीय कर्म करने वाले सबसे बड़ा समूह कहीँ नहीं होता। मन के कोने में एक टीस सदैव सालते रहती है की काम चाहे कितना भी अच्छा कयूं न कर लो, पुरस्कार के नाम पर सिर्फ डांट, फटकार, भर्त्सना,निलंबन और पदच्युति ही भाग्य में है। इससे व्यक्ति अपनी पूरी क्षमता से कार्य नहीं कर पाता।
             ये कुछ ऐसी विसंगतियां है, जिनसे भारत को मुक्त होना होगा। सराहनीय काम का असली सम्मान उसे मिले, जो उसका हकदार है। न की उसे जो बैठे बिठाये दूसरे के श्रम का पुरस्कार झटक ले।
              हमारे लिए बेहतर यह होगा की हम अपने  जीविकोपार्जन और सुखोपार्जन का कार्य अलग अलग चुने। सिर्फ जीविकोपार्जन के कार्य में अपनी सारी शक्तियां न झोंक दें, बल्कि अपनी ऊर्जा को बचा कर उस कार्य में अपना सर्वस्व लगाये, जिसमे हमे आनन्द आता हो । जिस कार्य में हमारी तन मन और आत्मा को संतुष्टि मिले, वही कार्य हमारे लिए श्रेयस्कर है।

No comments:

Post a Comment